Saturday, 14 May 2016
संगठन का मूल्य
एक मूर्ख
को कहीं से रेशम(silk) का थान
मिल गया । उसने थान को बेचने की सोची । साथ ही यह भी तय कर लिया कि पूरे को एक साथ
नहीं बेचना क्योंकि एक साथ ज्यादा पैसा जल्दी खर्च हो जाता है । थान को थोड़ा-थोड़ा
फाड़कर बेचना चाहिए । ऐसा विचार करके उस मूर्ख ने उस रेशम के थान की केंची से
कतरने-कतरने कर डाली । वह कुछ कतरने दुकान(shop) पर बेचने
हेतु ले आया । जहाँ वह जाता लोग उसकी हंसी करते और उसकी कतरनों को फैंक देते व
मूर्ख की उपाधि साथ में देते । अब कतरने चाहे रेशम की हों या मलमल (muslin) की । यह सब तो कूड़े के समान है । किसी
व्यक्ति ने उसे बताया कि इन कतरनों का कोई मूल्य नहीं पूरा थान लाते तो उसका मूल्य (value) था । अब उसके टुकड़ों की कोई कीमत नहीं
अर्थात उस थान के संगठित रूप का मूल्य था । यह बात उसकी समझ में आई और पछताने लगा
।
शिक्षा :- इसी
प्रकार समाज में अकेले व्यक्ति का मूल्य और शक्ति कम होती है । संगठन का महत्व
अधिक है । संगठन में ही शक्ति है।
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