Saturday, 14 May 2016

न्यायकारी राजा और किसान



ईरान देश का राजा बड़ा न्यायकारी, पवित्र आत्मा और प्रजा-पालक था जिसका शुभ नाम नौशेरवान था ।
एक समय वह सैर करने निकला तो एक बूढ़े किसान को जिसकी आयु 80 वर्ष की होगी , देखा । वह खेत में एक फलदार वृक्ष लगा रहा था । उसको देख राजा बोला-ऐ भले आदमी तुम्हारे पाँव तो कब्र
में लटक रहे है अर्थात मृत्यु सिर पर है , क्या तुम इस वृक्ष का फल खा सकोगे अर्थात जब तक यह वृक्ष बड़ा होकर फल देगा तब तक तुम मर चुके होगे । बूढ़ा किसान बोला राजन! मेरे दादा ने जो वृक्ष लगाए थे उनका फल मेरे पिता आदि ने खाया और जो वृक्ष मेरे पिता जी ने लगाए थे उसका फल हम खाते रहे और खा रहे है। अब जो मैं लगा रहा हूँ इसका फल मेरी संतान और पीछे होने वाले मनुष्य खाएँगे, मैं दूसरों के उपकार के लिए ही इसको लगा रहा हूँ ।
राजा बूढ़े की शुद्ध भावना व उच्च विचारों को सुनकर बड़े प्रभावित हुए और उसी समय एक सौ दिनार दिया । किसान हंस पड़ा और उस धन को स्वीकार करता हुआ बोला-राजन! मेरे वृक्ष तो बोते ही मुझे फल देने लग गए अर्थात जो पुरस्कार स्वरूप दिनारे मिली ।
शिक्षा :- हमें अपनी ही उन्नति से संतुष्ट नहीं रहना चाहिए किन्तु सबकी भलाई व उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिए । अपने लिए तो पशु-पक्षी भी जीते है । मनुष्य को परोपकारी होना अनिवार्य है ।  

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