
संदीपनी नामक महात्मा के
विद्यालय में अनेकों विद्यार्थी पढ़ा करते थे। उन्हीं में सुदामा और श्रीकृष्ण भी थे। हालांकि श्रीकृष्ण राज परिवार के बालक थे, और सुदामा किसी गरीब निर्धन ब्राह्मण के पुत्र थे परंतु फिर भी इन दोनों में परस्पर
घना प्रेम थे। प्राचीन काल में
धनी तथा निर्धन परिवार के बालक मिल कर एक ही
गुरुकुल में पढ़ा करते थे। धनी और निर्धन में कोई भेद नहीं समझा जाता थे उनको एक
जैसा भोजन और एक जैसे वस्त्र वहां से मिलते थे। कुछ दिनों में सुदामा और श्रीकृष्ण की मित्रता
सुदृढ़ हो गयी। दोनों मिलकर जंगल में घूमते और आश्रम के लिए फल-फूल तथा ईंधन लाया
करते थे। विद्या समाप्त कर दोनों अपने-अपने घरों को चले
गए । श्रीकृष्णजी तो धीरे-धीरे महान व्यक्ति बन गए। उन्होने पापी कंस का भरी सभा
में वध कर अपने माता-पिता को कैद से छुड़ाया। नाना को राजसिंहासन पर बैठाया ।
कौरवों के चचेरे भाई पांडवों से उनके वंश का पहले ही संबंध था उनकी फूफी पांडवों
की माता थी। श्रीकृष्ण का देश-विदेश में डंका बज उठा । वे महान योद्धा, महान विद्वान बन गए। उन्होने चुन-चुन कर अनेकों
पापियों को मरवा दिया और स्वयं मथुरा से द्वारिका में जा बसे। इधर सुदामा ईश्वर उपासना में ही लगा रहा। वह
सच्चे ब्राह्मण की भांति जीवन बिता रहा था। समय आया जबकि उसको पेट पालना भी कठिन
हो गया। उसकी पत्नी ने उसे द्वारका में श्रीकृष्ण से मिलने तथा कुटुम्ब के पालन
पोषण हेतु धन मांगने के लिए भेजा।
सुदामा चावलों की तुच्छ
भेंट लेकर द्वारका की ओर चल पड़े। बहुत
कष्ट उठाकर अंत में द्वारका नगरी में पहुंचा।
सुदामा के वस्त्र फटे हुए थे। नंगे पांव चलने से पांव छलनी-छलनी हो गए थे। शरीर
बेहाल हो रहा था। कृष्णजी के महलों के आगे खड़ा होकर सोच रहा था कि भीतर किस प्रकार
पहुंचा जाए? एक
द्वारपाल ने आकार पूछा- ओ ब्राह्मण तू क्या देख रहा है? सुदामा- मैं महाराज कृष्ण का बालमित्र हूँ। मैं
उनसे मिलने आया हूँ। द्वारपाल से सुदामा के आने की सूचना पाकर श्रीकृष्ण व्याकुलता से
भागते हुए पहुंचे। पुराने मित्र को देखकर महाराज ने सुदामा को गले लगा लिया। उसका
हाथ पकड़कर उसको महल ले गए। दिल खोलकर उसके साथ विद्यार्थी काल की बातें की। कुछ
हंसी मज़ाक भी की। सोने के पात्र में जल भरकर मित्र के पैर धोये। सुंदर वस्त्र
पहनाए। अनेक प्रकार के भोजनों से तृप्त किया। सुदामाजी कई दिनों वहां रहे । किन्तु
कुछ मांगा नहीं, महाराज अपने मित्र की अवस्था को देख कर ही समझ
गए थे कि उसका मित्र धन तथा रहने को स्थान आदि न होने के कारण दुखी है। कुछ ही
दिनों में उसके लिए भवन बनवा दिया और गृह को धन-धान्य से पूर्ण कर दिया।
शिक्षा :- महाराज श्रीकृष्ण एक सच्चे-मित्र थे। सच्चा मित्र वही कहलाता है, जो अपने मित्र की मित्रता को
नहीं भूलता तथा जो कठिनाई के समय मित्र को सहायता करता है।
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