दो भाई थे । अचानक
एक दिन पिता चल बसे । भाइयों में बंटवारे की बात चली-''यह तू ले, वह मैं लूं, वह मैं लूंगा, यह तू ले ले ।'' आए दिन दोनों बैठे सूची बनाते, पर ऐसी सूची न बना सके, जो दोनों को ठीक लगे । जैसे-तैसे बंटवारे का
एक घड़ा मिट्टी का
बना था, दूसरा पीतल का। दोनों नदी के किनारे रखे थे। इसी
समय नदी में बाढ़ आ गई, बहाव में दोनों घड़े
बहते चले। बहुत समय मिट्टी के घड़े ने अपने को पीतलवाले से काफी फासले पररखना चाहा। पीतलवाले घड़े ने
कहा, ''तुम डरो नहीं दोस्त, मैं तुम्हें धक्के न लगाऊँगा।''
मुन्नी और चुन्नी में लाग-डाट
रहती है । मुन्नी छह बर्ष की है, चुन्नी पाँच की । दोनों सगी बहनें
हैं । जैसी धोती मुन्नी को आये, वैसी ही चुन्नी को । जैसा गहना
मुन्नी को बने, वैसा ही चुन्नी को । मुन्नी 'ब' में पढ़ती
मोती राजा साहब की खास सवारी का हाथी।
यों तो वह बहुत सीधा और समझदार था, पर कभी-कभी उसका मिजाज गर्म हो जाता था और वह आपे में न रहता
था। उस हालत में उसे किसी बात की सुधि न रहती थी, महावत का दबाव भी न मानता था। एक बार
इसी पागलपन में उसने अपने महावत को मार डाला। राजा साहब ने वह खबर सुनी तो उन्हें
बहुत क्रोध आया। मोती की पदवी छिन गयी। राजा साहब की सवारी से निकाल दिया गया।
कुलियों की तरह उसे लकड़ियां ढोनी पड़तीं,
जब रियासत देवगढ़ के दीवान सरदार सुजानसिंह बूढ़े हुए तो परमात्मा की
याद आई। जा कर महाराज से विनय की कि दीनबंधु! दास ने श्रीमान् की सेवा चालीस साल
तक की, अब मेरी अवस्था भी ढल गई, राज-काज संभालने की शक्ति
नहीं रही। कहीं भूल-चूक हो जाए तो बुढ़ापे में दाग लगे।
बादशाह अकबर अपने मंत्री
बीरबल को बहुत पसंद करता था। बीरबल की बुद्धि के आगे बड़े-बड़ों की भी कुछ नहीं चल
पाती थी। इसी कारण कुछ दरबारी बीरबल से जलते थे। वे बीरबल को मुसीबत में फँसाने के
तरीके सोचते रहते थे।
अकबर के
एक खास दरबारी ख्वाजा सरा को अपनी विद्या और बुद्धि पर बहुत अभिमान था। बीरबल को
तो वे अपने